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11 अप्रैल 2026
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धौलपुर में निजी स्कूलों की मनमानी! किताबों के नाम पर ‘कमीशन राज’

धौलपुर में निजी स्कूलों की मनमानी! किताबों के नाम पर ‘कमीशन राज’
धौलपुर में निजी स्कूलों की मनमानी! किताबों के नाम पर ‘कमीशन राज’

प्रशासन बेखबर या बेपरवाह?
दैनिक सम्राट संवाददाता
धौलपुर
। जिले में शिक्षा के नाम पर बड़ा खेल चल रहा है, लेकिन जिम्मेदार विभाग आंखें मूंदे बैठा नजर आ रहा है। निजी स्कूलों की मनमानी इस कदर बढ़ चुकी है कि अभिभावक आर्थिक शोषण का शिकार हो रहे हैं, और प्रशासन की कार्रवाई सिर्फ कागजों तक सीमित दिखाई दे रही है।
सबसे बड़ा आरोप किताबों को लेकर सामने आया है। नियमों को ताक पर रखकर कई निजी विद्यालय एनसीईआरटी पाठ्यक्रम को नजरअंदाज कर अपनी मनमर्जी की महंगी किताबें छात्रों पर थोप रहे हैं। यही नहीं, इन किताबों को खरीदने के लिए अभिभावकों को चुनिंदा दुकानों पर भेजा जा रहा है—जहां कीमतें भी मनमानी वसूली जा रही हैं।
‘एक दुकान-एक सिस्टम’ का दबाव: अभिभावकों का कहना है कि स्कूल प्रबंधन खुलेआम दबाव बनाकर एक ही दुकान से किताबें, कॉपियां, यूनिफॉर्म और अन्य सामग्री खरीदने को मजबूर करता है। जबकि नियम साफ कहते हैं कि ऐसी सामग्री कम से कम तीन दुकानों पर उपलब्ध होनी चाहिए और स्कूल परिसर में बिक्री पूरी तरह प्रतिबंधित है। इसके बावजूद खुलेआम नियमों की धज्जियां उड़ रही हैं।
किताबों में कमीशन का बड़ा खेल उजागर: इस पूरे मामले में एक स्थानीय दुकानदार के खुलासे ने सिस्टम की पोल खोल दी है। जानकारी के मुताबिक, 100 रुपये की एमआरपी वाली किताब होलसेलर को करीब 27 रुपए में मिलती है। परिवहन और अन्य खर्च जोडऩे के बाद भी बड़ा हिस्सा बचता है—जिसमें लगभग 50 प्रतिशत तक का हिस्सा स्कूल संचालकों के पास पहुंचने का आरोप है।
नियम सिर्फ कागजों में, जमीन पर फेल सिस्टम: नियमों के अनुसार, स्कूलों को सत्र शुरू होने से एक माह पहले किताबों की सूची लेखक, प्रकाशक और मूल्य सहित सार्वजनिक करनी होती है। लेकिन अधिकांश स्कूल इस नियम का पालन नहीं कर रहे। अभिभावकों को न तो सही जानकारी दी जा रही है, न ही विकल्प।
251 निजी स्कूल, लेकिन निगरानी शून्य: ब्लॉक में करीब 251 निजी स्कूल संचालित हैं, लेकिन इतनी बड़ी संख्या के बावजूद शिक्षा विभाग की निगरानी बेहद कमजोर नजर आ रही है। सवाल उठता है कि आखिर इतनी खुली मनमानी के बावजूद अब तक ठोस कार्रवाई क्यों नहीं हुई?
अब जागा प्रशासन, जांच कमेटी का दावा: मुख्य ब्लॉक शिक्षा अधिकारी महेश कुमार शर्मा का कहना है कि मामले को गंभीरता से लिया जा रहा है और जांच के लिए कमेटी गठित की जा रही है। जल्द ही स्कूलों का निरीक्षण शुरू होगा और कार्यक्रम अधिकारी को भी जिम्मेदारी सौंपी जाएगी।
लेकिन बड़ा सवाल वहीं, अब तक कार्यवाही क्यों नहीं?: जब अभिभावक लंबे समय से परेशान हैं, शिकायतें लगातार सामने आ रही हैं, तो फिर प्रशासन अब तक क्यों चुप था? क्या कार्रवाई सिर्फ आश्वासन तक सीमित रहेगी या वाकई इस ‘कमीशनखोरी’ पर लगेगा ब्रेक?
अभिभावकों की मांग, मनमानी पर लगे लगाम: स्थानीय लोगों और अभिभावकों ने प्रशासन से सख्त कार्रवाई की मांग की है। उनका कहना है कि शिक्षा को व्यापार बनने से रोकना होगा, नहीं तो आम परिवारों के लिए बच्चों की पढ़ाई बोझ बनती जाएगी। अब देखने वाली बात यह होगी कि प्रशासन का यह "एक्शन मोड" जमीन पर उतरता है या फिर यह मामला भी अन्य शिकायतों की तरह फाइलों में दबकर रह जाएगा।