नई दिल्ली। धार्मिक स्थलों में महिलाओं से भेदभाव के मामले में सुनवाई के दौरान गुरुवार को सुप्रीम कोर्ट ने मंदिरों और मठों में प्रवेश को लेकर अहम टिप्पणी की। कोर्ट ने कहा कि कि प्रत्येक व्यक्ति को हर मंदिर और मठ में जाने का अधिकार होना चाहिए।
लेकिन अगर आप यह कहते हैं कि यह प्रथा है और धर्म का मामला है, और मैं सबको बाहर कर दूंगा सिर्फ मेरे संप्रदाय के लोग ही मेरे मंदिर में आएंगे और कोई नहीं आएगा, तो ये ङ्क्षहदू धर्म के लिए अच्छा नहीं है। समाज बंट जाएगा। धर्म पर बुरा असर पड़ेगा। धर्म पर बुरा असर नहीं पडऩा चाहिए।
हर व्यक्ति को मंदिर-मठ में प्रवेश का अधिकार हो
प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली नौ न्यायाधीशों की संविधान पीठ आजकल धार्मिक स्थलों में महिलाओं से भेदभाव के मामले में सात कानूनी सवालों विचार कर रही है। इसमें केरल के सबरीमाला मंदिर में 10 से 50 वर्ष की महिलाओं के प्रवेश पर प्रतिबंध का मामला भी शामिल है।
पीठ ने मंदिरों में प्रत्येक व्यक्ति को प्रवेश के अधिकार पर ये टिप्पणी उस वक्त की जब नायर सर्विस सोसाइटी, अयप्पा सेवा समाजम और क्षेत्र संरक्षण समिति जैसे संगठनों की ओर से पेश वरिष्ठ वकील सीएस वैद्यनाथन ने दलील दी कि एक संप्रदाय का मंदिर अनुमति और पूजा पाठ की इजाजत दे सकता है और या इसे सिर्फ उसी संप्रदाय तक सीमित रख सकता है।
वैद्यनाथन ने इस संबंध में संप्रदाय के मंदिरों को मिले अधिकार के बारे में सुप्रीम कोर्ट के पूर्व के फैसलों का हवाला भी दिया। जब वे ये दलीलें दे रहे थे तभी पीठ की न्यायाधीश बी.वी. नागरत्ना ने कहा कि थोड़ा देर को सबरीमाला विवाद को अलग रख देते हैं। लेकिन एक आशंका है। अगर आप मंदिर में प्रवेश के बारे में वेंकटरमण देवारू के फैसले की बात करते हैं, जिसमें कहा गया है कि गौड़ सारस्वत ब्राम्हणों के अलावा किसी और को प्रवेश नहीं मिलेगा - तो इसका ङ्क्षहदू धर्म पर बुरा असर पड़ेगा।
जस्टिस नागरत्ना ने आगे कहा कि हर किसी को हर मंदिर - मठ में जाने का अधिकार होना चाहिए। सबरीमाला विवाद को एक तरफ रख दें, लेकिन अगर आप यह कहते हैं कि यह प्रथा है और धर्म का मामला है, कि मै दूसरों को बाहर रखूंगा और सिर्फ मेरे संप्रदाय के लोग ही मंदिर में जाएंगे, और कोई नहीं, तो ये हिंदू धर्म के लिए अच्छा नहीं है। धर्म पर कोई बुरा असर नहीं पडऩा चाहिए।
ये उस संप्रदाय के लिए ही नुकसानदेह साबित होगा। जस्टिस नागरत्ना से सहमत होते हुए जस्टिस अरविंद कुमार ने कहा कि इससे समाज बंटेगा। जस्टिस नागरत्ना ने कहा कि अगर आप कहते हैं कि केवल एक विशेष समूह के लोगों को ही अनुमति है, केवल उन्हीं को यहां आना चाहिए, सांख्य दर्शन के अनुयायी श्रंग्रेरी नहीं जा सकते।
सुप्रीम कोर्ट सबरीमाला मामले पर भी सुनवाई कर रहा
श्रंग्रेरी के अनुयायी कहीं और नहीं जा सकते, तो ये वास्तविकता नहीं है। ऐसा संभव नहीं है। वास्तविकता यह है कि लोग यहां - वहां जाते हैं। उन्होंने कहा कि वह ये बात केवल मंदिर में प्रवेश के बारे में कह रही हैं बाकी रीति रिवाज आदि के बारे में नहीं कह रहीं। उन्होंने कहा कि ऐसा नहीं होने पर राज्य संविधान के अनुच्छेद 25 (2) (बी) के तहत हस्तक्षेप कर सकता है।
हम संवैधानिक प्रविधानों के आधार पर परीक्षण कर रहे हैं इसलिए इस बात को इतना ऊंचा मत उठाइये। वैद्यनाथन ने केरल के छोटे मंदिरों में इस तरह के प्रचलन की जब दलील दी तो जस्टिस नागरत्ना ने कहा कि छोटे और निजी मंदिरों की बात मत करिये। सार्वजनिक मंदिरों की बात करिए।
वैद्यनाथन ने कहा कि जो मंदिर सिर्फ अपने संप्रदाय के लोगों के लिए होते हैं वे न तो सरकार से, न निजी दानदाता से और न ही आम जनता से फंड मांग सकते हैं, क्योंकि वे उन पर निर्भर नहीं हैं। उन्होंने कहा कि अगर कोई कानून बनाना है तो उसे सार्वजनिक व्यवस्था, नैतिकता या स्वास्थ्य की कसौटी पर खरा उतरना पड़ेगा।
मालूम हो कि देवारू फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने मद्रास मंदिर प्रवेश प्राधिकरण अधिनियम को सही ठहराया था। कोर्ट ने कहा था कि जहां मंदिर सभी हिंदुओं के लिए खुला रहता है, वहीं कुछ धार्मिक अनुष्ठान जो गौड़ सारस्वत ब्राम्हणों के लिए आरक्षित हैं, वे संवैधानिक रूप से मान्य हैं। मामले में अगले सप्ताह फिर सुनवाई होगी।
सबरीमाला मंदिर सुनवाई: ‘मंदिरों में जाने का हर व्यक्ति को अधिकार, नहीं तो समाज बंट जाएगा’: सुप्रीम कोर्ट
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