कोचिंग संस्थानों में मेडिकल प्रवेश परीक्षा नीट की तैयारी का बढ़ता दबाव, शिक्षा विभाग ने मूंद रखी है आंखे
दैनिक सम्राट संवाददाता
जमवारामगढ़ (अंकिता शर्मा)। चिकित्सा क्षेत्र में भविष्य बनाने के लिए अभिभावक अपने बच्चों को 9वीं या 10वीं कक्षा से ही कोचिंग संस्थानों में भेजना शुरू कर देते हैं। विद्यार्थी स्कूलों में केवल औपचारिक उपस्थिति दर्ज करवाते हैं, जबकि वास्तविक पढ़ाई कोचिंग संस्थानों में होती है। ऐसे विद्यार्थियों को शिक्षा जगत में डमी विद्यार्थी कहा जाने लगा है। जानकारी के अनुसार नीट परीक्षा की तैयारी करवाने में एक विद्यार्थी पर प्रतिवर्ष ढाई से तीन लाख रुपये तक खर्च आता है। इसमें कोचिंग फीस, हॉस्टल, पीजी, भोजन, टेस्ट सीरीज और अध्ययन सामग्री का खर्च शामिल होता है। कई विद्यार्थी चार से पांच वर्षों तक फाउंडेशन कोर्स और नियमित कोचिंग के माध्यम से तैयारी करते हैं। मेहनती विद्यार्थी और उनके परिवार दो से तीन बार तक परीक्षा में प्रयास करते हैं ताकि सरकारी मेडिकल कॉलेज में प्रवेश मिल सके।अभिभावकों का कहना है कि प्रतियोगिता इतनी बढ़ चुकी है कि बिना कोचिंग सफलता मुश्किल मानी जाती है।
यही कारण है कि परिवार अपनी आर्थिक स्थिति कमजोर होने के बावजूद लाखों रुपये खर्च कर बच्चों को कोचिंग दिलवा रहे हैं। कई परिवार खेती, जमीन और आभूषण तक गिरवी रख तैयारी का खर्च उठा रहे हैं।
वहीं शिक्षाविदो का मानना है कि डमी स्कूल व्यवस्था से नियमित स्कूली शिक्षा प्रभावित हो रही है। निजी स्कूलों में केवल नामांकन चलने और विद्यार्थियों की वास्तविक उपस्थिति नहीं होने को लेकर समय-समय पर शिकायतें मिलती रहती हैं। राज्य सरकार और शिक्षा विभाग द्वारा ऐसे स्कूलों पर कार्रवाई की चेतावनी भी दी जाती रही है, लेकिन प्रतिस्पर्धी परीक्षाओं के बढ़ते दबाव के कारण यह व्यवस्था लगातार फैलती जा रही है। शिक्षाविदों का कहना है कि शिक्षा का उद्देश्य केवल प्रतियोगी परीक्षा तक सीमित नहीं होना चाहिए। विद्यार्थियों के सर्वांगीण विकास के लिए नियमित विद्यालयी शिक्षा भी उतनी ही आवश्यक है।
इनको बॉक्स में लगाना है
शिक्षा विभाग कसे नकेल
कोचिंग में फांउडेशन कोर्स करने वाले डमी विद्यार्थियो के बारे में शिक्षा विभाग को नकेल कसने की जरूरत है। कोचिंग संस्थान ही विद्यार्थियों को डमी विद्यार्थी के रूप में निजी स्कूलो में नामांकित करवाते है।
डमी विद्यार्थी से निजी स्कूल मालामाल
नीट,आइआइटी,जेईई,एनआइटी,व एनडीए जैसी प्रतिष्ठित परीक्षाओ में प्रवेश के लिए विद्यार्थी डमी विद्यार्थी के रूप में निजी स्कूलो में दाखिला लेते है। निजी स्कूल संचालक 20 से 25 हजार रूपए प्रति छात्र-छात्रा लेते है। ऐसे में संबंधित निजी स्कूल बिना कोई खर्चा किए ही मालामाल हो रहे है।
परीक्षा व प्रेक्टिकल देने आते है
डमी विद्यार्थी के रूप में नामांकित बच्चे विद्यालय में सिर्फ परीक्षा व प्रायोगिक परीक्षाए देने आते है। डमी विद्यार्थियों के सत्रांक व प्रेक्टिकल में खूब नम्बर आ रहे है। जो शिक्षा विभाग की मानिटरिंग को पोल खोलता नजर आ रहा है।
कोचिंग हब के नाम से मशहूर शहर
प्रदेश में कोचिंग हब के रूप में सीकर व कोटा का नाम पहले नम्बर है। जयपुर, जोधपुर, अजमेर व उदयपुर में भी बडे कोचिंग संस्थान है। देश में दिल्ली, पटना, हैदराबाद, पुणे, मुम्बई, चेन्नई जैसे बडे शहर कोचिंग हब के नाम से मशहूर है। इन शहरो में लाखों विद्यार्थी डमी विद्यार्थी के रूप में पढते है
इनका कहना है
स्कूलों में डमी विद्यार्थी पढऩे की कोई शिकायत कभी नही मिली ओर विभाग से कभी इस संबंध में जानकारी नही मांगी गयी है। इस कारण कभी इस संबंध में जांच नही की गई है।
-अनिता शर्मा, सीबीइओ जमवारामगढ़