दैनिक सम्राट संवाददाता
धौलपुर (उत्तम दीक्षित)। ग्राम अधन्नपुर में चल रही संगीतमय श्रीमद्भागवत कथा ज्ञानयज्ञ के दूसरे दिन बाल ब्रह्मचारी संत अवधूत स्वामी लोकेशानंद जी महाराज गुफाधाम जारौली टीला सरकार वालों के श्रीमुख से भरिक्त चरित्र और प्रभु श्रीराम को वनवास क्यों प्रसंगों का अत्यंत मार्मिक वर्णन किया गया। इस दौरान पंडाल में मौजूद बड़ी संख्या में श्रद्धालु भक्ति रस में सराबोर नजर आए।
कथा व्यास लोकेशानंद महाराज ने भक्ति चरित्र पर प्रकाश डालते हुए कहा कि निस्वार्थ भाव से की गई भक्ति ही मानव जीवन को सार्थक बनाती है। उन्होंने भक्तों को समझाया कि संसार में रहते हुए धर्म और सदाचार के मार्ग पर कैसे चला जाए। उन्होंने कहा कि भक्ति में अहंकार का कोई स्थान नहीं होता, और जो व्यक्ति प्रभु के चरणों में खुद को पूरी तरह समर्पित कर देता है, उसका कल्याण निश्चित है। कथा के अगले चरण में व्यास पीठ से प्रभु श्रीराम के वन गमन का प्रसंग सुनाया गया। कथावाचक ने विस्तार से बताया कि आखिर मर्यादा पुरुषोत्तम राम को क्यों वनवास जाना पड़ा। उन्होंने कहा कि राजा दशरथ ने रानी कैकेयी को देवासुर संग्राम के समय दो वरदान दिए थे। मंथरा की दासी बुद्धि के प्रभाव में आकर कैकेयी ने राजा दशरथ से राम के लिए 14 वर्ष का वनवास और भरत के लिए राजतिलक मांग लिया। श्रीराम ने अपने पिता के वचनों को निभाने और रघुकुल की रीति को अक्षुण्ण रखने के लिए बिना किसी संकोच के राजपाठ त्याग दिया और वन गमन स्वीकार किया।
जब कथावाचक ने लक्ष्मण और माता सीता के साथ श्रीराम के तपस्वी भेष में महल से विदा होने का प्रसंग सुनाया, तो पूरा कथा पंडाल शांत हो गया। इस मार्मिक दृश्य और भजनों को सुनकर कई महिला व पुरुष श्रद्धालुओं की आंखें नम हो गईं। कथा के समापन पर मुख्य यजमानों सोबरन सिंह अरेला, भगवंत सिंह अरेला, राजेश मरैया, दिनेश चंद्र रावत, बृजेश उपाध्याय, योगेश चौबे, राजकुमार बिथरिया, शाशिकांत, कृष्णकांत, ब्रजमोहन, पुरुषोत्तम, मोतीराम अरेला, भीमसेन, संतोष, आदित्येन्द्र, लोकेंद्र द्वारा भागवत आरती उतारी गई और उपस्थित सभी भक्तों के बीच महाप्रसाद का वितरण किया गया।
निस्वार्थ भाव से की गई भक्ति ही मानव जीवन को बनाती है सार्थक: स्वामी लोकेशानंद
निस्वार्थ भाव से की गई भक्ति ही मानव जीवन को बनाती है सार्थक: स्वामी लोकेशानंद