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15 अप्रैल 2026
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क्या मिडिल ईस्ट के युद्ध में चीन की होगी एंट्री?

क्या मिडिल ईस्ट के युद्ध में चीन की होगी एंट्री?
क्या मिडिल ईस्ट के युद्ध में चीन की होगी एंट्री?

नई दिल्ली। इस्लामाबाद में अमेरिका और ईरान के बीच मध्यस्थता की कोशिशें विफल होने के बाद पश्चिम एशिया का तनाव अब खतरनाक मोड़ पर पहुंच गया है।
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप ने होर्मुज स्ट्रेट पर व्यापक नौसैनिक नाकेबंदी की घोषणा कर दी है, जिससे हालात केवल ईरान-अमेरिका तक सीमित नहीं रहे, बल्कि पूरी दुनिया के लिए बड़ा संकट बनते दिख रहे हैं। यह वही समुद्री रास्ता है, जहां से दुनिया के तेल का बड़ा हिस्सा गुजरता है।
टकराव के केंद्र में आ गया चीन
सबसे बड़ा सवाल चीन को लेकर खड़ा हो गया है। चीन, जो ईरान का सबसे बड़ा तेल खरीददार है, अब सीधे इस टकराव के केंद्र में आ सकता है।
चीन के रक्षा मंत्री ने साफ कहा है कि उनके व्यापार और ऊर्जा समझौतों में कोई दखल बर्दाश्त नहीं होगा। ऐसे में अगर अमेरिका चीनी जहाजों को रोकने की कोशिश करता है, तो यह टकराव सीधे अमेरिका-चीन संघर्ष में बदल सकता है। अमेरिका पहले ही चेतावनी दे चुका है कि अगर चीन ने ईरान को हथियार दिए, तो उसे भारी आर्थिक कीमत चुकानी होगी।
ग्रे जोन रणनीति अपना सकता है चीन
विशेषज्ञ मानते हैं कि चीन सीधे युद्ध में नहीं उतरेगा, लेकिन वह ग्रे जोन रणनीति अपना सकता है। इसमें वह दुर्लभ खनिज और सेमीकंडक्टर जैसे अहम उत्पादों की आपूर्ति रोक सकता है, जिससे पश्चिमी देशों की अर्थव्यवस्था पर बड़ा झटका लगेगा। इसके साथ ही ताइवान या दक्षिण चीन सागर में सैन्य दबाव बढ़ाकर भी चीन हालात को और जटिल बना सकता है।
ऊर्जा के मोर्चे पर भी स्थिति बेहद गंभीर है। चीन अपनी कुल तेल जरूरत का बड़ा हिस्सा खाड़ी देशों और ईरान से लेता है। होर्मुज पर संकट गहराने का मतलब है कि वैश्विक तेल आपूर्ति पर सीधा असर पड़ेगा, जिससे कीमतों में भारी उछाल आ सकता है।
खतरा सिर्फ होर्मुज तक सीमित नहीं है। यमन के हूती विद्रोही बाब-अल-मंदेब जलडमरूमध्य को निशाना बना सकते हैं, जो लाल सागर को हिंद महासागर से जोड़ता है। यहां से दुनिया के करीब 12 प्रतिशत तेल और 10 प्रतिशत व्यापार गुजरता है। अगर यह रास्ता भी प्रभावित हुआ, तो यूरोप के लिए तेल आपूर्ति लगभग ठप हो सकती है।
यूरोप सबसे ज्यादा प्रभावित
यूरोप पहले ही इस संकट से सबसे ज्यादा प्रभावित दिख रहा है। उसे खाड़ी से आने वाले तेल के लिए वैकल्पिक रास्ते खोजने पड़ सकते हैं, जिससे लागत, समय और महंगाई तीनों बढ़ेंगे। जहाजों को अफ्रीका के लंबे रास्ते से जाना पड़ेगा, जिससे वैश्विक सप्लाई चेन पर भी असर पड़ेगा।
कुल मिलाकर, होर्मुज की नाकेबंदी अब सिर्फ एक क्षेत्रीय रणनीति नहीं रही, बल्कि यह एक ऐसे वैश्विक टकराव की शुरुआत बन सकती है, जिसमें ऊर्जा, व्यापार और बड़ी ताकतें सब एक साथ उलझती नजर आ रही है।