बड़े शहरों के बाद कस्बों तक फैले फाउंडेशन स्कूल, प्रतियोगिता ने बढ़ाया आर्थिक दबाव
दैनिक सम्राट संवाददाता
जयपुर (अंकिता शर्मा)। देश में मेडिकल और इंजीनियरिंग प्रवेश परीक्षाओं की तैयारी अब केवल शिक्षा का माध्यम नहीं रह गई है, बल्कि यह सवा लाख करोड़ रुपए से अधिक का विशाल उद्योग बन चुकी है। नीट, जेईई मेन और आईआईटी प्रवेश परीक्षाओं की बढ़ती प्रतिस्पर्धा ने कोचिंग संस्थानों, फाउंडेशन स्कूलों, हॉस्टलों, टेस्ट सीरीज और ऑनलाइन प्लेटफॉर्म का बड़ा बाजार खड़ा कर दिया है। बड़े शहरों के बाद अब छोटे कस्बों में भी फाउंडेशन कोर्स संचालित करने वाले स्कूलों और कोचिंग संस्थानों की बाढ़ आ गई है।
प्रतियोगी परीक्षाओं में पेपरलीक गिरोह सक्रिय
विशेषज्ञों का मानना है कि यही विशाल आर्थिक तंत्र पेपरलीक माफियाओं के लिए भी कमाई का बड़ा जरिया बन चुका है। करोड़ों विद्यार्थियों की प्रतियोगिता और सीमित सीटों के कारण कुछ लोग अवैध तरीके से सफलता पाने के लिए भारी रकम खर्च करने को तैयार हो जाते हैं। यही कारण है कि विभिन्न प्रतियोगी परीक्षाओं में पेपरलीक गिरोह सक्रिय हो रहे हैं। कई मामलों में लाखों से करोड़ों रुपए तक के लेनदेन सामने आए हैं। पेपरलीक की घटनाएं योग्य और मेहनती विद्यार्थियों के भविष्य को सबसे अधिक नुकसान पहुंचाती हैं। वर्षों तक मेहनत करने वाले छात्र तब निराश हो जाते हैं जब अनुचित तरीके अपनाने वाले अभ्यर्थी आगे निकल जाते हैं। इससे शिक्षा व्यवस्था की विश्वसनीयता पर भी सवाल खड़े होते हैं तथा प्रतिभाशाली विद्यार्थियों का मनोबल टूटता है।
नीट की तैयारी पर ६६ हजार करोड़ खर्च
आंकड़ों के अनुसार देशभर में हर वर्ष लगभग 22 लाख विद्यार्थी नीट परीक्षा की तैयारी करते हैं। यदि प्रति विद्यार्थी औसतन तीन लाख रुपए सालाना खर्च माना जाए तो केवल नीट तैयारी पर ही करीब 66 हजार करोड़ रुपए खर्च हो रहे हैं। इसके अलावा करीब पांच लाख विद्यार्थी फाउंडेशन कोर्स में शामिल होते हैं, जिन पर लगभग 15 हजार करोड़ रुपए सालाना खर्च होने का अनुमान है। वहीं जेईई और आईआईटी परीक्षाओं की तैयारी करने वाले करीब 20 लाख विद्यार्थियों पर लगभग 60 हजार करोड़ रुपए सालाना खर्च बैठता है। इस प्रकार मेडिकल और इंजीनियरिंग प्रवेश परीक्षाओं की तैयारी का कुल बाजार सवा लाख करोड़ रुपए से अधिक का माना जा रहा है।
प्रतियोगिता इतनी बढ़ चुकी है कि अभिभावक बच्चों को सफल बनाने के लिए लाखों रुपये खर्च करने से पीछे नहीं हट रहे। कई परिवार शिक्षा के लिए कर्ज तक ले रहे हैं। कोटा, जयपुर, दिल्ली, हैदराबाद और पटना जैसे बड़े कोचिंग हब के बाद अब छोटे शहरों और कस्बों में भी इंटीग्रेटेड स्कूल और फाउंडेशन बैच खुल रहे हैं।
अंतिम समय पर पेपर जनरेशन
विशेषज्ञों के अनुसार पेपरलीक रोकने के लिए परीक्षा प्रणाली में तकनीकी सुरक्षा बढ़ाना आवश्यक है। प्रश्नपत्रों का डिजिटल एन्क्रिप्शन, अंतिम समय पर पेपर जनरेशन, परीक्षा केंद्रों पर कड़ी निगरानी, साइबर ट्रैकिंग और दोषियों के खिलाफ त्वरित कठोर कार्रवाई जरूरी मानी जा रही है। इसके साथ ही कोचिंग और प्रवेश परीक्षा व्यवस्था में पारदर्शिता बढ़ाने तथा विद्यार्थियों पर अत्यधिक प्रतिस्पर्धात्मक दबाव कम करने की भी आवश्यकता महसूस की जा रही है। कोचिंग संस्थानों के पेपरलीकर्स के नेटवर्क का धवस्त होना जरूरी।
पेपरलीकर्स का कोचिंग संस्थानों से जुड़ाव साबित हो रहा
पेपरलीक करने व करवाने में कोचिंग संस्थानों की भूमिका भी सामने आ रही है। लातूर महाराष्ट्र में कोचिंग संचालक शिवराज मोटेगांवकर की गिरफ्तारी साबित करती है कि इस काम में कोचिंग संस्थान भी शामिल है।
कोचिंग संस्थानों में ज्यादा चयन करवाने को लेकर प्रतिस्पर्धा रहती है। इसमें प्रतिस्पर्धा के साथ कोचिंग की प्रतिष्ठा बढने के साथ में आय में वृद्धि होती है। प्रतिष्ठा व आय बढ़ाने के चक्कर में कई बार कदम गलत रास्ते पर बहक जाते है।
बडे शहरों के साथ छोटे
शहर व कस्बों में नीट,आइआइटी, जेईई, एनडीए व प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी के लिए फांउडेशन स्कूल व कोचिंगे खुल चुकी है। यह एक बड़ा व्यापार बन गया है।
-आरएस शर्मा, अभिभावक जमवारामगढ़।