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9 अप्रैल 2026
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अवसरवाद और आंतरिक दबाव ने बिगाड़ा पाकिस्तान का खेल, नहीं बना पाया इस्लामिक नाटो

अवसरवाद और आंतरिक दबाव ने बिगाड़ा पाकिस्तान का खेल, नहीं बना पाया इस्लामिक नाटो
अवसरवाद और आंतरिक दबाव ने बिगाड़ा पाकिस्तान का खेल, नहीं बना पाया इस्लामिक नाटो

 नई दिल्ली। पाकिस्तान की वैश्विक राजनीति में अग्रणी बनने की हसरत अब एक रणनीतिक दु:स्वप्न में बदल चुकी है। कभी 'इस्लामिक नाटो' का नेतृत्व करने और पश्चिम एशिया में सुरक्षा प्रदाता बनने का ख्वाब देखने वाला इस्लामाबाद आज अंतरराष्ट्रीय स्तर पर विश्वसनीयता के संकट से जूझ रहा है।

'फील्ड मार्शल' जनरल आसिम मुनीर के नेतृत्व में पाकिस्तान ने सऊदी अरब के साथ रक्षा समझौता कर तुर्किये, मिस्त्र और सोमालिया को एक सूत्र में पिरोने की कोशिश की थी, लेकिन मौजूदा वैश्विक संघर्षों ने पाकिस्तान की रणनीतिक खोखलेपन को उजागर कर दिया है।

आंतरिक दबाव ने बिगाड़ा पाकिस्तान का खेल

अवसरवाद और आंतरिक दबाव ने बिगाड़ा खेल जब अमेरिका-इजरायल-ईरान संघर्ष गहराया, तो सऊदी अरब को उम्मीद थी कि पाकिस्तान अपने रक्षा समझौते का सम्मान करेगा। लेकिन पाकिस्तान की 'अवसरवादी' नीति आड़े आ गई।

पाकिस्तान के सामने दोहरी चुनौती है - वह अपने देश की 15 प्रतिशत शिया आबादी को नाराज नहीं कर सकता, जो सेना के हर स्तर पर मौजूद हैं।

दूसरी ओर, वह अमेरिका या इजरायल का साथ देकर सुन्नी बहुसंख्यक आबादी के गुस्से का जोखिम नहीं उठा सकता, जो इस युद्ध को धार्मिक चश्मे से देख रहे हैं। इस दोराहे पर खड़े पाकिस्तान की चुप्पी ने उसे खाड़ी देशों की नजरों में एक अविश्वसनीय साझेदार बना दिया है।

कूटनीतिक विफलता और सीमा पर बढ़ता तनाव रणनीतिक विफलता का आलम यह है कि जनरल मुनीर ने जब अमेरिका और ईरान के बीच मध्यस्थता की पेशकश की, तो तेहरान ने उसे सिरे से खारिज कर दिया।

जनवरी 2025 में बलूचिस्तान में जैश-अल-अदल पर ईरानी हमलों ने दोनों देशों के बीच अविश्वास की खाई को और चौड़ा कर दिया है। घर में और बाहर गिरती साख को बचाने के लिए अब मुनीर अफगानिस्तान और बलूचिस्तान में आक्रामकता दिखा रहे हैं।

काबुल में स्कूल पर बमबारी जैसी अमानवीय घटनाओं और 'ऑपरेशन सिंदूर' में मिली हार के बाद, मुनीर अपनी छवि बचाने के लिए किसी भी हद तक जा सकते हैं।

विशेषज्ञों का मानना है कि 'फील्ड मार्शल' की पदवी हासिल करने वाले मुनीर अब एक हताश व्यक्ति हैं। वह न केवल बलूचिस्तान और खैबर पख्तूनख्वा में दमन चक्र चला रहे हैं, बल्कि अपनी विफलता से ध्यान भटकाने के लिए भारत सीमा पर भी दुस्साहस कर सकते हैं।

भारतीय सुरक्षा एजेंसियां इस स्थिति को देखते हुए हाई अलर्ट पर हैं, क्योंकि एक हताश सैन्य नेतृत्व अक्सर आंतरिक विफलताओं को ढंकने के लिए बाहरी मोर्चे पर आग लगाने की कोशिश करता है।