अमरीकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के लिए 'यू-टर्न' लेना कोई नई बात नहीं है, लेकिन ईरान से लड़ाई में उनकी ताजा घोषणा इस जंग में उनका सबसे बड़ा 'यू-टर्न' कहा जा सकता है। उन्होंने ईरान को नेस्तनाबूद करने की धमकी देते हुए डेडलाइन दी और मियाद खत्म होने से पहले दो सप्ताह का यूद्ध-विराम घोषित कर दिया।
कई मोर्चों पर घिरे ट्रंप
असल में, ट्रंप के लिए युद्ध को जारी रखना दिन-ब-दिन उनके लिए ज्यादा खतरनाक होता जा रहा था। 28 फरवरी, 2026 को युद्ध शुरू करते वक्त उन्होंने शायद ही सोचा हो कि ईरान इतना लंबा टिक पाएगा। खास कर तब जब ईरान के सुप्रीम लीडर को लड़ाई की शुरुआत में ही खत्म कर दिया गया हो।
ईरान के दमदार जवाब के चलते ट्रंप कई मोर्चों पर फंस गए। न केवल सामरिक मोर्चे पर, बल्कि राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय मोर्चे पर भी।
युद्ध रोकना ट्रंप की मजबूरी
ईरान पर हमला बोलने के ट्रंप के मनमाने फैसले का खामियाजा पूरी दुनिया को भुगतना पड़ रहा है। इससे अमरीकी भी अछूते नहीं रहे। अमरीकी भी महंगाई और वित्तीय अनिश्चितता के माहौल से जूझ रहे हैं। वहां का जनमत भी युद्ध के खिलाफ है। ट्रंप की रिपब्लिकन पार्टी को आने वाले महीनों में मध्यावधि चुनाव का सामना करना है। युद्ध लंबा चला तो कांग्रेस से खर्च की मंजूरी लेते रहना भी आसान नहीं है। इन सब घरेलू परिस्थितियों के मद्देनजर युद्ध रोकना ट्रंप की मजबूरी बन चुकी है।
कहां ट्रंप सोच रहे थे कि वह वेनेजुएला की तरह ईरान के तेल भंडार पर भी अपना नियंत्रण कायम कर लेंगे, लेकिन उनकी सोच पर हकीकत भारी पड़ी। स्ट्रेट ऑफ होर्मुज की बंदी से ईरान ने अनेक देशों की मुसीबत बढ़ा दी। दुनिया भर में तेल के दाम बढ़ने लगे और इसकी आंच में अमरीकी भी तपने लगे।
महंगाई और आर्थिक मुसीबत
अमरीका में गैस की कीमत मार्च में 4 डॉलर तक बढ़ गई थी। तेल-गैस के दाम बढ़ने से दुनिया भर में शेयर बाजार और सोना-चांदी के भाव गिर रहे थे। इससे न केवल निवेशक, बल्कि आम लोग भी हलकान थे। शिपिंग कंपनियां डीजल महंगा होने के नाम पर 'यूएस सरचार्ज' लगाने लगी थीं। ढुलाई महंगी होने के चलते अमरीका सहित दुनिया भर में खाने-पीने की चीजें समेत अन्य सामान महंगे हो रहे थे। खाद का संकट पैदा होने का खतरा बढ़ गया (दुनिया का एक-तिहाई यूरिया स्ट्रेट ऑफ होर्मुज से होकर ही सप्लाई होता है। दुनिया भर में हवाई कंपनियों ने टिकट महंगा कर दिया। भारत सहित कई जगह गैस से चलने वाले प्लांट्स में उत्पादन कम या बंद हो गया। भारत के कई शहरों से मजदूरों का पलायन देखा गया।
उत्पादन भी खतरे में
एल्युमिनियम, हीलियम, नेप्था, प्लास्टिक और कई केमिकल्स की सप्लाई बाधित हुई। दुनिया का 20 फीसदी कच्चा एल्युमिनियम मध्य-पूर्व के देशों से ही आता है। हीलियम की 25 फीसदी सप्लाई कतार और स्ट्रेट ऑफ होर्मुज के जरिए होती है। एआई चिप्स बनाने के लिए हीलियम जरूरी है।
युद्ध के चलते कई देशों का निर्यात भी बुरी तरह प्रभावित हुआ। भारत से मध्य-पूर्व जाने वाला करीब चार लाख मीट्रिक टन बासमती चावल या तो भारतीय बंदरगाहों या रास्ते में फंसा रहा।
यूके मैरीटाइम ट्रेड ऑपरेशंस के मुताबिक एक अप्रैल तक स्ट्रेट ऑफ होर्मुज में 16 जहाजों पर हमले हुए। बीमा कंपनियों ने मध्य पूर्व जाने वाले जहाजों पर लोड होने वाले कंटेनर्स का प्रीमियम बढ़ा दिया।
जान-माल का नुकसान भारी
युद्ध में इजरायल, ईरान व पश्चिम एशिया के देशों में लगभग (7 अप्रैल तक) 3800 लोग मारे गए हैं और करीब 39000 घायल हुए हैं। मरने वालों में अमरीका के भी 13 सैनिक हैं। उसके 200 सैनिक जख्मी भी हुए हैं।
कूटनीतिक मोर्चे पर भी कमजोर हुआ अमरीका
अमरीका को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी विरोध झेलना पड़ रहा था। कई देशों ने युद्ध में इस्तेमाल करने के लिए अपनी हवाई व समुद्री सीमाएं उसके लिए बंद कर दी थीं। ब्रिटेन ने करीब 60 देशों को लामबंद कर स्ट्रेट ऑफ होर्मुज को खोले जाने के लिए अमरीका पर दबाव बनाने की ठोस पहल की थी। ऐसे में ट्रंप हर तरफ से घिरते जा रहे थे।
पाकिस्तान को बनाया हीरो
बर्बादी का अल्टिमेटम देकर युद्धविराम की घोषणा करके ट्रंप ने अमरीकी धाक और साख को भी कमजोर किया है। पाकिस्तान की मध्यस्थता में युद्ध विराम की घोषणा कर अमरीका ने आतंकवाद को बढ़ावा देने के आरोपी पाकिस्तान की कूटनीतिक अहमियत बढ़ाई है। यह वही पाकिस्तान है, जहां अमरीका में आतंकी हमला करने वाला ओसामा बिन लादेन छुपा था और अमरीका ने पाकिस्तान में घुस कर उसे मारा था। भारत में कई आतंकी हमलों का मास्टरमाइंड आज भी पाकिस्तान में आजाद घूम रहा है।
सर्वशक्तिमान होने की छवि को धक्का
ट्रंप के इस फैसले से अमरीका के सर्वशक्तिमान होने की छवि को भी धक्का लगा है। ट्रंप ने खुद ही युद्ध शुरू किया और खुद ही जीत का ऐलान कर युद्धविराम घोषित कर दिया। वह भी अपनी शर्तों पर नहीं।